त्रिजुगी नारायण मंदिर | world oldest religious Temple | Kedarnath Yatra

त्रिजुगी नारायण मंदिर

उत्तराखंड वह भूमि है जिसे सभी देवी देवता ऋषि मुनियों ने तपस्याके लिए चुना था इसी लिये इसे देब भूमि कहते हैं| इसी में से एक जगह है जो पवित्र तीर्थस्थल के रूप में लोकप्रिय हैं।

त्रिजुगी नारायण जहाँ माना जाता है कि देवों के देव शिवऔर देवी पार्वती का विवाह इसी जगह में हुआ था जहाँ त्रेता युग से आग्नि जलती आ रही है जिसे आज भी उस विवाह का गवाह माना जाता है।

त्रिजुगी नारायण मंदिर जो उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में त्रिजुगी नारायण गांव में स्थित है| कहते हैं कि तीन युगों से जलती हुई आ रही अखंड ज्योति से इस जगह का नाम त्रियुगी पड़ा

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त्रिजुगी नारायण मंदिर केदारनाथ के पास है| सोनप्रयाग से मंदिर लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर है सोनप्रयाग के पास ही में गौरीकुंड है जहां पर पार्वती ने भगवान शिवजी को पाने के लिए कठोर तपस्या की थी,

गौरीकुंड जो सोनप्रयाग से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर है। साथ ही ये भी पौराणिक मान्यता है कि गुप्तकाशी में भगवान शिव ने पार्वती से विवाह प्रस्ताव स्वीकार किया था
त्रिजुगी नारायण पूरे संसार का सबसे पुराना धार्मिक स्थल है| मंदिर के अंदर एक हवन कुंड है इस कुण्ड में हर समय अग्नि जलती रहती है। जिसे अखंड धुनी कहते हैं अखंड धुनी के ठीक सामने मंदिर के गर्भगृह में देवी लक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु विराजमान हैं|

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इस अखंड धुनी के बारे में कहा जाता है कि इसे स्वयं भगवान विष्णु ने प्रज्वलित किया था ।यह अखंड धुनी उसी समय से जलती आ रही है जब भगवान शिव-पार्वती ने अग्नि को साक्षी मानकर शादी के फेरे लिए थे|

कहते हैं यह अग्नि तब से लेकर आज तक जली आ रही है इस अग्नि में भक्त लोग लकड़ियां चढ़ाते हैं और साथ ही इस अग्नि की राख को ले जाते हैं इस कुंड की रख को विभूति भी कहते हैं|भग्त इसे प्रसाद के रूप में ले जाते हैं| जिससे उनके पारिवारिक और वैवाहिक जीवन हमेशा सुखमय बना रहता है|

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विवाह समारोह से पहले देवताओं ने यहीं पर चार कुंड में स्नान किया था जीनो उन्ही के नाम से जाना जाता है जो आज भी उस जगह पर हैं| और गाय दान के समय गाय को बांधा गया था वह खूंटा भी है|

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ब्रह्मकुंड
मंदिर के ठीक सामने ब्रह्मकुंड हैं |कहा जाता है कि भगवान शिव और पार्वती की शादी से ठीक पहले ब्रह्मा जी ने इस कुंड में स्नान किया था

रूद्र कुंड ब्रह्मकुंड के उपर की तरफ  रूद्र कुंड है रूद्र कुंड के अंदर शिवलिंग ब्रह्मकुंड और रूद्र कुंड में भक्त नहा सकते हैं|

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ब्राह्मण कुंड और रूद्र कुंड में स्नान करने का बड़ा मातम माना गया है
विष्णु कुंड
विष्णु कुंड पानी भगवान विष्णु के चरणों से आता है इससे चरणामृत प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है|
नारद कुंड
विष्णु कुंड के साथ ही में नारद कुंड है नारद कुंड के पास ही शंकर पार्वती जी की जोड़ी मूर्ति है
सरस्वती कुंड

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शंकर पार्वती जी की जोड़ी मूर्ति के साथ ही सरस्वती कुंड है|इसे उत्तरवाहिनी भी कहते हैं|
सूर्य कुंड
सरस्वती कुंड के साथ ही सूर्य कुंड है जो मंदिर के गर्भ गृह में है यहां अंदर नहीं जा सकते सूरज कुंड का पानी से ही भगवान के लिए भोग लगाया जाता है| सूर्य कुंड के अंदर और मंदिर के गर्भ गृह में केवल मंदिर के पुजारी ही जा सकते हैं|

सूर्य कुंड के ठीक बगल पर ही शादी की बेदी है जहां पर भगवान शिव और पार्वती जी का विवाह हुआ था
साथ ही गाय दान के समय गाय को बांधा गया वह खूंटा भी है

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जब भगवान शिव और पार्वती का विवाह संपन्न् हो गया और माता-पिता के आशीर्वाद लेने के बाद  पार्वती को साथ लेकर शिवजी अपने धाम कैलाश पर्वत पर चले गए।
कुछ लोगों का ये भी माना है कि त्रियुगीनारायण मंदिर की स्थापना त्रेतायुग में हुआ था। और वही पर केदारनाथ व बदरीनाथ मंदिर की स्थापना द्वापरयुग में हुआ था

त्रिजुगी नारायण मंदिर  की पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार देवी पार्वती हिमनरेश हिमवान और उनकी रानी मैनावती की पुत्री थी। त्रिजुगी नारायण  हिमावत की राजधानी थी।देवी सती ने माँ पार्वती के रूप में अपना दूसरा जन्म लिया था और भगवान शिव को पाने के लिए उन्होंने कठोर तपस्या की

और उनकी इसी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव माँ पार्वती से विवाह के लिए तैयार हुए भगवान शिव और पार्वती के विवाह में भगवान विष्णु ने पार्वती के भाई के रूप में सभी रीतियों का पालन किया था।

जबकि ब्रह्मा इस विवाह में पुरोहित थे। उस समय सभी संत-ऋषि मुनियों देवताओं ने इस समारोह में भाग लिया था। इस का वर्णन पुराणों में भी मिलता है। विवाह समारोह से पहले देवताओं ने यहीं पर चार छोटे छोटे कुंड में स्नान किया था

दूसरी पौराणिक कथा ये भी है कि इन्द्रासन पाने के लिए राजा बलि को 100 यज्ञ करने थे | उनमे से राजा ने 99 यज्ञ पुरे किये , तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि को रोक दिया , जिससे की राजा बली का यज्ञ भंग हो गया , इसलिए विष्णु भगवान् को इस स्थान पर वामन देवता के रूप में पूजा जाता है |

त्रिजुगी नारायण मंदिर का मौसम

यहां की मौसम की बात की जाए तो ज्यादा ऊंचाई पर होने के कारण मौसम ठंडा ही रहता है और सर्दियों में यहाँ पर बहुत बर्फबारी होती है

त्रिजुगी नारायण मंदिर कैसे पहुंचें

त्रिजुगी नारायण मंदिर पहुंचने के लिए नजदीकी एयरपोर्ट जौली ग्रांट देहरादून और रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है वहां से आप बाय बस या कार रुद्रप्रयाग,गुप्तकाशी, केदार नाथ के पास सोनप्रयाग आता है सोनप्रयाग से मंदिर लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर है|सोनप्रयाग के पास ही में गौरीकुंड है जहां पर पार्वती ने भगवान शिवजी को पाने के लिए कठोर तपस्या की थी, जो सोनप्रयाग से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर है।
शादी के पवित्र बंधन में बंधने के लिए लोग दूर-दूर से इस स्थान पर शादी करने के लिए आते हैं यहां पर रहने और ठहरने के लिए पूरी सुविधाएं उपलब्ध हैं|

Sunil jamloke

 

त्रिजुगी नारायण मंदिर की पूरी वीडियो देखें

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