आपदा में लोगों को पता चलता है कि एनडीआरएफ़, एसडीआरएफ़ के साथ आ गया है, तो उनकी आधी चिंता समाप्त हो जाती है-गृह मंत्री अमित शाह

केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह 7 अप्रैल 2022 को दिल्ली के विज्ञान भवन में राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) द्वारा आयोजित आपदा प्रतिक्रिया के लिए क्षमता निर्माण पर वार्षिक सम्मेलन – 2022 में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। इस अवसर पर गृह राज्य मंत्री श्री नित्यानंद राय, केन्द्रीय गृह सचिव और एनडीआरएफ़ के महानिदेशक श्री अतुल करवाल सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

अपने संबोधन में केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में एनडीएमए, सभी मुख्यमंत्रियों की अध्यक्षता में एसडीएमए और एक समग्र एकीकृत दृष्टिकोण के साथ आपदा प्रबंधन को विश्वास के साथ केन्द्र और राज्य सरकारों ने ज़मीन पर उतारा है। नब्बे के दशक से पहले हमारा राहत-केन्द्रित दृष्टिकोण था, इसमें जान-माल बचाने की कोई गुंजाइश नहीं थी और न ये योजना का हिस्सा था। अब अर्ली वॉर्निंग, स्क्रिय निवारण, शमन और पूर्व तैयारी आधारित जान-माल को बचाने के वैज्ञानिक कार्यक्रम पर हमने काफ़ी काम किया है। आज विश्व में आपदा मोचन के क्षेत्र में हम बराबरी पर और कई क्षेत्रों में आगे भी खड़े हैं।

अमित शाह ने कहा कि वर्ष 2016 में देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने एनडीएमए की एनडीएमपी योजना शुरू की। ये देश में तैयार की गई पहली राष्ट्रीय आपदा योजना है और सेन्डाई आपदा जोखिम निम्नीकरण फ़्रेमवर्क-2015 से 2030 के सभी मानकों से मैच करती है। पहली बार सरकार की सभी ऐजेंसियों, विभागों के हॉरीज़ॉन्टल और वर्टिकल एकीकरण की योजना बनाई गई और इसका परिणाम हमारे सामने है। इस योजना में पंचायत, शहरी, स्थानीय निकाय के स्तर तक सरकार को और अलग-अलग सरकारी विभागों को, कलेक्टर को नोडल ऐजेंसी बनाकर जोड़ा गया है। 2016 में इस योजना में 11 आपदाओं का समावेश किया गया था और 2019 में 17 आपदाओं का इसमें समावेश किया गया है। यह बताता है कि हम निरंतर हर प्रकार की आपदाओं पर काम कर रहे हैं और आपदाओं से होने वाली मृत्युओं की संख्या में हम बहुत कमी लाए हैं और यह हमारी बहुत बड़ी उपलब्धि है।

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केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि कोई अगर ये सोचता है कि सिर्फ़ साधनों या रिसर्च पेपर से आपदा मोचन का काम नहीं हो सकता। इसे नीचे तक पहुंचाने वालों की क्षमता का निर्माण बहुत ज़रूरी है क्योंकि कई ऐजेंसियों को मिलकर काम करना है। एक दूसरे की भूमिका पर स्पष्टता और अगर कहीं किसी की भूमिका में कोई गैप आता है तो उसे भरने की सिद्धता हासिल किए बिना नीचे तक आपदा मोचन का काम ठीक से नहीं हो सकता। इस प्रकार के अभ्यास से ही राज्यों, ज़िलों और नीचे गांवों तक के साथ एक आपसी समन्वय का निर्माण होता है और अंत में ये आपसी समन्वय ही आपदा से लोगों के जान-माल को बचाने का कारण बनता है।

अमित शाह ने कहा कि तकनीक और विज्ञान के कारण आज हमें समयपूर्व सूचना मिल जाती है, लेकिन जब तक उसे सटीक ढंग से नीचे तक पहुंचाने, आपदा की दृष्टि से आपदा संभावित स्थान को सतर्क करने, बचाने की कार्रवाई करने, सबसे पहले जान और फिर संपत्ति का नुक़सान कम करने में प्रोफ़ेश्नल महारत हासिल नहीं होती तब तक आपदा मोचन का काम सफल नहीं हो सकता। उन्होने कहा कि इन सब कार्यों से संबन्धित 5-6 ऐजेंसियों के बीच समन्वय का प्रोटोकॉल और इसका प्रैक्टिकल अनुभव भी बहुत जरूरी है।

केंद्रीय गृह मंत्री ने एनडॉआरएफ़ के कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा कि कहा कि शायद ही किसी संस्था ने अपने जन्म के इतने कम समय में 130 करोड़ की जनता वाले इस विशाल देश की जनता में अपने काम के प्रति श्रद्धा का निर्माण किया हो। देश में कहीं भी, किसी भी क्षेत्र में, किसी भी प्रकार की आपदा आती है और लोगों को जब पता चलता है कि एनडीआरएफ़, एसडीआरएफ़ के साथ आ गया है, तो उनकी आधी चिंता समाप्त हो जाती है। इस श्रद्धा का निर्माण सरकारी परिपत्रों से नहीं हो सकती, बल्कि कृत्यों से हो सकती है। अनेक घटनाओं के दौरान एनडीआरएफ़ ने मौक़े पर रिस्पॉंड किया है और जान-माल की रक्षा की है, इसी कारण इसके प्रति लोगों की श्रद्धा बनी है। दुनियाभर के आपदा मोचन और आपदा प्रतिक्रिया क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं के बीच भी एनडीआरएफ़ ने अपना सिक्का जमाकर अपना स्थान निश्चित किया है और ये देश के लिए यह बहुत गौरव की बात है। कई बार पड़ोसी देशों में जाकर भी एनडीआरएफ़ ने मानवता की दृष्टि से उनकी मदद की है और विश्व में भारत का संदेश पहुंचाया है।

अमित शाह ने कहा कि भारत में वर्ष 2000 से 2022 तक का समय आपदा प्रबंधन के क्षेत्र के लिए स्वर्णिम काल माना जाएगा। बीस साल के इतने कम अंतराल में भारत में बहुत लंबी यात्रा करके हम एक यशस्वी स्थान पर पहुंचे हैं। आपदा प्रबंधन हमारे देश में कोई नई बात नहीं है, हम सबने भगीरथ के बारे में सुना है कि उन्होंने गंगा को पृथ्वी पर उतारा। लेकिन आज उत्तराखंड की पहाड़ियों से गंगा को बंगाल के सागर तक जाते हुए देखते हैं तो पता लगता है कि किसी ने साइंटिफ़िक तरीक़े से सोचकर ये रास्ता बनाया और बाढ़ प्रबंधन का बहुत बढ़िया काम करने के साथ ही जल प्रबंधन भी मज़बूती के साथ किया है। इसीलिए हज़ारों साल बाद भी कोई व्यक्ति जब बहुत अच्छा, साइंटिफ़िक तरीक़े से और मेहनत से प्रयास करता है तो उसे हम भगीरथ प्रयास कहते हैं।

नब्बे के दशक से पहले हमारे यहां कोई साइंटिफ़िक व्यवस्था नहीं थी। आपदा के समय सबसे पहले उसके रखरखाव और पैसा देने का ही विचार आता था और आपदा से जान-माल की सुरक्षा का कॉन्सेप्ट ही नहीं था। लेकिन एनडीआरएफ़ के भगीरथ प्रयासों के कारण आज हम 20 साल से भी कम समय में ही बहुत बड़ी यात्रा तय कर चुके हैं। 1999 के ओडिशा के सुपर साइक्लोन को सबने देखा है जिसमें दस हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हुई थी, 2001 के गुजरात भूकंप में हज़ारों लोगों की जान गई थी, लेकिन आज हम ऐसे स्थान पर खड़े हैं कि कितने भी साइक्लोन आ जाएं, मौत को हम एक प्रतिशत से भी कम पर ले आए हैं।

 

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि केन्द्र सरकार द्वारा कई इनिशिएटिव लिए गए और राज्य सरकारों ने भी इसको बहुत अच्छी तरीके से रिस्पॉन्ड किया है। अब तक 26 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में एसडीआरएफ का गठन हो चुका है। एसडीआरएफ के गठन के समय ही एनडीआरएफ उसके प्रशिक्षण के साथ जुड़ता है, इसी कारण इतने बड़े देश में एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और पंचायत स्तर पर प्रबंधन के क्षेत्र में एकरूपता लाने में सफलता मिली है। फेडरल स्ट्रक्चर का सम्मान करते हुए हमने इस सफलता को प्राप्त किया है। अब तक लगभग 21,000 से ज्यादा एसडीआरएफ कर्मियों को प्रशिक्षित किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि अब तक 32 गाइडलाइन बनाई गई है जिनमें से आठ पिछले ढाई वर्ष में बनाई गई है।

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शीत लहर, भूकंप से सुरक्षा, छत को ठंडा करने के लिए हाउस ओनर्स गाइडलाइन, ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड, हीटवेव गाइडलाइन, भूस्खलन के जोखिम, विकलांगता समावेशी आपदा जोखिम निम्नीकरण, आपदा प्रभावित परिवारों के लिए अस्थाई घर, इन 8 गाइडलाइनों को 2 साल में बनाकर देश के राज्यों को भेजने का काम किया है। इस काम को गति, सम्मान देने और एक्नॉलेज करने के लिए देश के प्रधानमंत्री जी ने सुभाष चंद्र बोस आपदा प्रबंधन पुरस्कार भी शुरू किया है। आजादी के बाद पहली बार आपदा प्रबंधन को राष्ट्रीय स्तर पर इस प्रकार अनुमोदन मिला है और प्रथम पुरस्कार इसी वर्ष 23 जनवरी को एनडीआरएफ की आठवीं बटालियन को इंस्टिट्यूशन के रूप में दिया गया है। उन्होंने कहा कि यह पुरस्कार देखने में छोटी चीज है मगर पुरस्कार प्राप्त करने की स्पर्धा और आकांक्षा यह उत्कृष्टता की ओर ले जाती है और यह गौरव भी प्रदान करती है।

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अमित शाह ने कहा कि पहले से तैनाती की नीति के तहत जो एडवांस में सूचनाएं मिलती हैं, इसमें बल की सक्रिय उपलब्धता को राज्यों ने भी सुनिश्चित करने के लिए बहुत अच्छा काम किया है। जहाँ भी सूचना या अलर्ट गया, पहले से तैनाती का जो सिद्धांत है, उसे राज्यों ने जमीन पर उतारने के लिए काम किया है और एनडीआरएफ की 12 बटालियन हमेशा राज्यों और एसडीआरएफ के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रहती हैं। इसे और नीचे ले जाने के लिए आपदा मित्र स्कीम को 350 जिलों में लागू करने का काम किया गया है जिसका लक्ष्य एक लाख से ज्यादा युवा वॉलिंटियर्स तैयार करना है। कोई गांव ऐसा ना छूट जाए जहां युवाओं की एक टुकड़ी इससे प्रशिक्षित ना हो, कोई शहर का वार्ड ऐसा ना छूट जाए जहां पर युवाओं की एक टुकड़ी आपदा निवारण की सभी विधाओं में प्रशिक्षित ना हो। उन्हें सीमित काम करना है मगर अफवाह न फैले, समय पर लोगों को जोखिम वाले क्षेत्र से बाहर निकालना, कुछ प्राथमिक तरह की सूचनाएं देना और जब वैक्यूम आता है, तो एसडीआरएफ की जगह काम भी करना, इन सारी चीजों को उनकी ट्रेनिंग का हिस्सा बनाया गया है।

बहुत सारे ऐप्प भी बनाए गए हैं, मौसम ऐप्प, चक्रवात, भारी वर्षा, गर्मी और शीत लहर जैसी सभी चीजों के लिए उपलब्ध है। मेघदूत किसानों द्वारा मौसम आधारित कृषि प्रबंधन के लिए बनाया गया है, दामिनी बिजली चेतावनी के लिए बनाया गया है। इन ऐप्प को नीचे तक पहुंचाने के लिए एक तंत्र ज़रूर बनाना चाहिए क्योंकि जो अलर्ट आता है वह बहुत सटीक होता है और समय से पहले मिलता है। अगर वह कलेक्टर तक पहुंचे पर कलेक्टर से गांव तक नहीं पहुंचता है तो इस अलर्ट का बहुत कम उपयोग हो सकता है। हम बड़ी-बड़ी आपदाओं में तो बहुत अच्छे से काम कर रहे हैं मगर बिजली गिरने जैसी आपदाओं में समय थोड़ा कम रहता है, इसलिए हमारे तंत्र को चुस्त-दुरुस्त करना होगा और कम समय में जहां पर बिजली गिरने वाली है उस क्षेत्र तक हमारा अलर्ट पहुंचे, इसका एक तंत्र खड़ा करने के लिए भी एनडीआरएफ को काम करना चाहिए। इन सारे ऐप्प को नीचे तक पहुंचाने के लिए अभी भी बहुत अधिक काम करने की जरूरत है।

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केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि जो कॉमन अलर्ट प्रोटोकोल लागू किया गया है उसका भी बहुत बड़ा फायदा हुआ है और नॉर्थ ईस्ट के क्षेत्र में नेसेक के द्वारा फ्लड मैनेजमेंट, सड़क एलाइनमेंट और इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण में पानी के प्रवाह को देखकर इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया जाए और पानी के प्रवाह को इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण से रोका न जाए, इस तरह भी बाढ़ की बहुत अच्छी मैपिंग की गई है। सड़क निर्माण के सभी कार्यक्रमों में फ्लड मैपिंग को अब हिस्सा बनाया जाता है।

उन्होंने कहा कि इस कांसेप्ट और इन सब अलर्ट को नीचे तक पहुंचाने के लिए एनसीसी, एनएसएस, होमगार्ड, इन सभी संगठनों को इसके साथ जोड़ना होगा। कुछ महिला स्वयंसहायता समूह, जो जागरूक हैं, उन्हें भी इसके साथ जोड़ना होगा, विशेषकर गांव की पंचायत को जोड़ना होगा। इसके लिए सारा साहित्य स्थानीय भाषाओं में बनाना पड़ेगा, ट्रेनिंग मॉड्यूल भी स्थानीय भाषा में बनाने पड़ेंगे और स्थानीय भाषाओं से तैयार किए हुए ट्रेनर इन्हें प्रशिक्षित कर उन्हें तैयार कर वहीं अपने राज्य में ट्रेनिंग करें, हमें इसका भी एक तंत्र बनाना पड़ेगा। एनसीसी, एनएसएस, होमगार्ड इन सबको जब तक नहीं जोड़ते तब तक हमें स्वयं सेवकों की उपलब्धता नहीं होगी और इस सारी योजना की सफलता इसी में है कि देश के किसी भी छोटे से छोटे हिस्से पर आपदा आए उस वक्त हमारा ट्रेंड किया हुआ व्यक्ति वहाँ उपलब्ध हो, वो खुद ही एनडीआरएफ का काम करे और जब तक एसडीआरएफ और एनडीआरएफ पहुंचे तब तक वह स्थिति को संभाले।