नारियल की पूजा क्यों की जाती और पोराणिक कथा क्या है जाने,

नारियल की पूजा

नारियल को ‘श्रीफल’ भी कहा जाता है। आमतौर पर शादी, त्योहार और किसी भी महत्वपूर्ण पूजा या पूजा सामग्री में नारियल का विशेष महत्व है। इतना ही नहीं, किसी के स्वागत में भी भेंटस्वरूप श्रीफल दिया जाता है। वेदों के जानकार के अनुसार नारियल में त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना गया है।

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हिंदू धर्म के ज्यादातर धार्मिक संस्कारों में नारियल का विशेष महत्व है,नारियल को शुभ और सबसे पवित्र फल कहा जाता है और नारियल पर बनी तीन आँखों की तुलना शिवजी के त्रिनेत्र से की जाती है. इसलिए नारियल को बहुत शुभ माना जाता है और पूजा-पाठ में प्रयोग किया जाता है.

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नारियल की पूजा पौराणिक कथा

नारियल की पूजा कथा पौराणिक ग्रंथों में अलग-अलग कथाएं भी विद्यमान हैं। शास्त्रों के अनुसार, पृथ्वी पर जब भगवान विष्णु का अवतरण हुआ तो वह बैकुंठ लोक से 3 चीजें लेकर आए, 1-लक्ष्मी, 2- कामधेनु 3- श्रीफल यानि नारियल, श्रीफल को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रिय फल कहा जाता है।

यही कारण है कि नारियल के वृक्ष को पुराणों में कल्पवृक्ष के नाम से भी संबोधित किया गया है। इस वृक्ष पर तीनों देव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) वास करते हैं। नारियल में उनके वास का प्रमाण भी दिखाई देता है क्योंकि फल में तीन बीज रूपी संकेत दिखाई देते हैं। श्रीफल को तोड़ने के बाद इन बीजों को खाया नहीं जाता है बल्कि भगवान को अर्पित कर दिया जाता है या हवन में आहुति दे दी जाती है।

नारियल की पूजा क्यों की जाती और पोराणिक कथा क्या है जाने,

पौराणिक ग्रंथों में ये भी कथा है मर्यादा पुरुषोत्तम राम के वशंज राजा पृथु के पुत्र सत्यव्रत परमप्रतापी राजा थे। राजा सत्यव्रत ने अपने जीवनकाल के अंतिम चरण में राजपाठ त्याग दिया था और सारा राजपाठ अपने पुत्र राजा हरिश्चंद्र को सौंप दिया था।

सत्यव्रत अपने जीवन के आखिरी दौर में स्वर्ग लोक जाने की इच्छा रखते थे लेकिन उन्हें स्वर्ग तक जाने का मार्ग ज्ञात नहीं था। राजा सत्यव्रत ऋषि विश्वामित्र के आश्रम पहुंचे फिर राजा सत्यव्रत ने मुनि विश्वामित्र कहा कि मैं धरती पर अपने सभी कर्म और धर्म पूरे कर चुका हूं। मुझे अब स्वर्ग जाना है और आप मुझे स्वर्ग जाने का रास्ता बताएं, फिर मुनि ने राजा की इच्छा को पूरा किया,और स्वर्ग जाने का रास्ता खोला

लेकिन देवराज इंद्र नहीं चाहते थे कि कोई मनुष्य स्वर्ग में दाखिल हो,इस बात को मुनि विश्वामित्र भी भलीभांति जानते थे,इंद्र स्वर्गलोक में हैं| और सत्यव्रत आने नही देंगे, हुआ भी वेसा ही सत्यव्रत को आने नही दिया गया, फिर विश्वामित्र ने दूसरा स्वर्ग बनाने की सोची । एक मजबूत खंभे का निर्माण किया। और दूसरे स्वर्गलोक का निर्माण किया,

जिसका नाम त्रिशंकु कहलाया। और इसे स्वर्ग से विपरीत दिशा में स्थित किया और इसके राजा सत्यव्रत को बनाया गया। जो बाद नारियल का पेड़ बना। इस तरह जो लोग स्वर्ग तक नहीं पहुंच पाए। उन्हें नारियल स्वर्ग का फल के रूप में मिला।इस लिए नारियल को स्वर्ग का फल भी कहा जाता है,

हिन्दू धर्म में वृक्षों के गुणों और उसके महत्व को समझते हुए उसे धर्म से जोड़ा गया है। उसमें ही नारियल का पेड़ भी शामिल है।

महिलाएं नारियल नहीं फोड़ती

कोई भी वैदिक या दैविक पूजन नारियल के बलिदान के बिना अधूरी मानी जाती है। यह भी एक वजह है कि महिलाएं नारियल नहीं फोड़तीं। श्रीफल बीज रूप है, इसलिए इसे उत्पादन अर्थात प्रजनन का कारक माना जाता है। श्रीफल को प्रजनन क्षमता से जोड़ा गया है।

स्त्रियों बीज रूप से ही शिशु को जन्म देती हैं और इसलिए नारी के लिए बीज रूपी नारियल को फोडऩा अशुभ माना गया है। देवी-देवताओं को श्रीफल चढ़ाने के बाद पुरुष ही इसे फोड़ते हैं।

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नारियल फोड़ने की परंपरा

कहते हैं एक समय हिंदू धर्म में बलि प्रथा सामान्य बात थी। तभी आदि गुरु शंकराचार्य ने इस अमानवीय परंपरा को तोड़ा और बलि के स्थान पर नारियल चढ़ाने की शुरुआत की।

नारियल फोड़ने का ये है महत्व

नारियल फोड़ने का मतलब है कि आप अपने अहंकार और स्वयं को भगवान के सामने समर्पित कर रहे हैं। माना जाता है कि ऐसा करने पर अज्ञानता और अहंकार का कठोर कवच टूट जाता है और ये आत्मा की शुद्धता और ज्ञान का द्वार खोलता है,

औषधीय गुणों के करण  नारियल को स्वर्ग का फल भी कहा जाता है

नारियल कई तरह के औषधीय गुणों से भरपूर हैं। इसमें पोटैशियम, फाइबर, कैल्शियम व मैग्नीशियम भरपूर मात्रा में पाया जाता है। ये कई बीमारियों के इलाज में भी काम आता है। नारियल में वसा और कॉलेस्ट्रॉल नहीं होता है, इसलिए यह मोटापे से भी निजात दिलाने में मदद करता है।

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