निरंकार भगवान की पूजा और पौराणिक कथा

निरंकार भगवान की पूजाई

उत्तराखण्ड के गांवों में देवी देवताओं के प्रति सदैव ही लोगों की गहरी आस्था रहती है| यहाँ समय समय पर देवताओं के मंदिरों में विभिन्न भक्ति कार्यक्रमों, अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है। ल्वींठा गांव।जो पट्टी चौबट्टाखाल,ब्लाक पोखणा जिला पौडी गड़वाल।में पड़ता है| इस गांव में लगभग 160 परिवार रहते हैं|

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हर 12 साल में निरंकार भगवान की पूजाई होती थी,अब लोगों का पलायन होने के करण पूजाई समय समय पर नहीं हो पाती  इस बार ये पूजाई 34 साल बाद हुई,पूजाई जब भी हो इसका समय एक ही रहता है| जो पूजा पूस (पोस)के महीने में निश्चित होती है,पुजाई का कार्यक्रम 15 दिसम्बर से 21 दिसम्बर तक होता है|

निरंकार भगवान पूजाई के समय जिन पर निरंकार देवता प्रकट होते हैं वह पूजा से 1 साल पहले से कैर में होते हैं, उनके केश बढ़ाए जाते हैं कैर के दौरान परिवार से अलग रहते हैं,न वो किसी से बात करते हैं नहीं कहीं बहार खाना खाते हैं,खुद ही अपना खाना बनाते हैं, सुबह शाम दोनो समय निरंकार भगवान की पूजा पाठ करना होता है|

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गांव में ही निरंकार भगवान जी का पौराणिक भंडार ग्रह है जहां पर पूजाई के दौरान निरंकार भगवान अपने पोराणिक भंडार देखने जाते है, देवता के गांव में केयर मारने के बाद पूजा के कठोर नियम हो जाते हैं इस दौरान गांव में चमड़े का सामान जूते चप्पल लोहे के हथियार लाना वर्जित हो जाता है गांव के लोग जो अपने इस्ट देवाता निरंकार की पूजा के लिए हमेसा नतमस्क रहते है|

निरंकार देवाता की पूजा इस बार 34 साल बाद हुई है| वैसे तो पूजाई की तैयारी काफी पहले से शुरू हो जाती है| पुजाई का कार्यक्रम 15 दिसम्बर से 21 दिसम्बर तक होता है| पुजाई के दौरान गांव के अंदर शराब व मांस मछली अंडे का सेवन पूर्ण रूप से प्रतिबंधित होता है|

पूजाई के समय  गांव के जितने लोग भी देश विदेश में होते हैं सब अपने गांव में पहुंच जाते हैं और अपने दिशाओं व रिश्तेदारों को पूजाई में आमंत्रित करते हैं,इस दौरान पूरे गांव वालों को अपनी दिशाओं (ध्याणी)  को बुलाना अनिवार्य होता है निरंकार भगवान दिशाओं (ध्याणी)  को बहुत मानते हैं,

निरंकार भगवान पुजाई के दौरान आस पास केगा गांव और  जो बिस्ट लोग बाहर गाँव में हैं उनको भी पूजाई में आमंत्रित किया जाता है| श्रिकोट,किमगिडी,रिंगवाड़ी,मालेई,अगरोड़ा,मल्लीबीणा और मेलगाँव के रावत बाकी श्रीकोट और मलीबीणा पड़ोसी गाँव को भी आमंत्रित करते हैं|

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पुजाई के दोरान देवता को नहलाने के लिए श्रीनगर लेके जाते हैं। श्रीनगर से नहाने के बाद शाम 5 बजे तक तक अपने भंडार में पहुंच जाते हैं।फिर उसके पश्चात रात को जागरण(नचाई) होता है। उसके बाद अगले दिन सुबह फिर देवता को विष्णु रूप देते हैं। फिर उनको हल्दी हाथ करते हैं बाने देते हैं,सारे शोका(शर्धालू) दिशा देवता को बाने देते हैं।

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फिर ढोल दमाऊ (बाजे) ओर झंडे(निशान) के साथ कुबेर भंडार, कंडी लेने और उसके बाद सुनार के यहां छत्र लेने जाते हैं। उसी दिन में २-३ बजे तक दलबल के साथ जात(दूसरे गांव के देवता जिन्हें आमंत्रित किया होता है) आती है।

पूजाई में 19 और 20 तारीख का दिन मुख्य होता है,जिसको यहां की भाषा में गोदामबरी मेला(पूजाई ) कहते हैं

निराकार भगवान की कथा –

वैसे तो निरंकार भगवान की कथा बहुत बड़ी है लेकिन हम कथा का कुछ अंश आपको बताते हैं

जागरों के अनुसार
किशोर सिंह बिष्ट (जागरी), भगवान विष्णु ने अलग-अलग रूप से अवतार लिया है इसलिए भगवान विष्णु का एक आकार नहीं है,उनके कई आकार हैं निराकार है निराकार भगवान ना इसकी कोई फोटो है हम लोग इनका असली रूप शिव जी का रूप माना जाता है और वैसे इनका विष्णु रूप भी है जब हम इनको नहलाते हैं तो उनका वह विष्णु रूप है और जब हम इनका मद बनाते हैं तब हम उनकी शिव जी के रूप में पूजा करते हैं

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पूजा का संबंध-

निरंकार भगवान की पूजा का संबंध महाभारत युद्ध से है दुशाला, राजा धृतराष्ट्र और गांधारी की पुत्री और कौरवों तथा पांडवों की इकलौती बहन थी। दुशाला का विवाह सिंधु राज्य के राजा जयद्रथ से हुआ था,महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद दुशासन की बहन दुशाला श्री कृष्ण पर नाराज हो जाती हैं| श्री कृष्ण भगवान ही विष्णु का रूप भी है, दुशाला श्री कृष्ण भगवान से कहती हैं| आपने पूरा महाभारत युद्ध कराया जिस में मेरा एक भी भाई नहीं बचा तब श्री कृष्ण (भगवान विष्णु) को दुशाला गुस्से में श्राप देती है|

आमा के बारे में –

आमा दुशाला को कहा जाता है|
जागर और कथाओं के अनुसार एक बार विष्णु भगवान का निवास क्षीर सागर है। उनका शयन शेषनाग के ऊपर है।विष्णु भगवान क्षीर सागर में लेटे हुए थे, तब उन पर अचानक से श्राप (दोष) लगना शुरू हुआ तो विष्णु भगवान ने अपने कान से मेल निकाला और सागर में डाला तो वहां से जला कुंडी हीत,हुए उत्पन्न हुए इनको अलग अलग नाम से भी पुकारा जाता है जैसे भ्रमदुंगी हीत ,बज्र्मुन्डी हीत , आदि  फिर हीत ने बोला, बोलो मामू क्या बात हुई मुझे कैसे याद किया निरंकार (विष्णु)भगवान ने बोला है भांजे हीत, हम पर सागर में किस बात का श्राप लगा है|

आप इस श्राप (दोष) का पता लगाने के लिए ब्रह्मा जी के पास जाओ, फिर हीत ब्रह्मा जी के पास जाते हैं। ब्रह्मा जी पूछते आप किस बारे में आए हो तो हीत ब्रह्मा जी बताते हैं  कि हमारे सागर में किस चीज का श्राप (दोष) लगा है।जिसकी वजह से विष्णु भगवान परेशान है| ब्रह्मा जी कहते  हैं- कि तुम्हारे सागर मैं दिशा (बहिन दुशाला) आमा का श्राप लगा है।आपको इसे मिटाना होगा तभी आप ठीक होंगे| फिर विष्णु भगवान दुशाला का दिया हुआ श्राप से मुक्त होने के लिए बहन आमा (दिशा)को मनाते हैं|

फिर भगवान निरंकार ने दुशाला (आमा)को मना ने के लिए नौलखा भंडारा देते हाँ (गोदामबरी मेला)इसे भी कहते हैं,ये कुंभ मेला  की तरह ही होता है| आमा का बार लगया जाता है यहाँ की भाषा में केदारी बार कहते हैं

पयांसुरी कि कथा-

पयां (पद्म) एक प्रकार का पेड़ है धार्मिक दृष्टि से इसका बडा महत्व है। पूजा के लिऐ पंया की पत्तियों और लकड़ी को पवित्र माना जाता हैं।कथाओ में कहा जाता है कि यह पेड़ नाग लोग में होता था इसे देवताओं का वृक्ष माना जाता है,

कथा के अनुसार पूजा में पयांसुरी(पयां या पद्म )होती है कहा जाता है कि यह पयांसुरी (पयां की पात्ती ) गहरे नाग लोक में जहरीले नागों के बीच होती है इसे लाने से ही पूजा संपन्न होगी, फिर पूरा गांव एक दिन पयांसुरी लेने के लिए वह ढोल दमाओं के साथ जाते हैं| और पयांसुरी पूजा में लेकर आते हैं|

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कुछ जगह पर पुजाई के दोरान निरंकार भगवान भी पयांसुरी लेने जाते हैं, लेकिन यहां पर निरंकार भगवान पयांसुरी लेने नहीं जाते हैं यहां पर हीत पयांसुरी लेने जाते हैं|

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कथा

राजा कश्यप की 2 रानी थी कद्रू और विनीता एक दिन दोनों रानी जोलामंग्रयू (नदी पानी लेने) गए तो वहां पर विनीता ने सूर्य भगवान को देखा ,उसने कदरू से कहा की सूर्य भगवान के कैसे घोड़े हैं। कदरू ने कहा सूर्य भगवान के काले घोड़े हैं विनीता ने कहा नहीं सूर्य भगवान के सफेद घोड़े है तब दोनों बहनों की शर्त लगी एक ने बोला काले घोड़े है दूसरे ने बोला सफेद घोड़े है।

कदरू के नाग थे और विनीता के गरुड़ ,उसके बाद कदरू नागों के भंडार गई वहां उसने कहा वैसे तो सूर्य भगवान के सफेद घोड़े होते हैं पर हम दोनों सोतों कि शर्त लगी है तो आप सुबह जाके सूर्य भगवान को घेर लेना फिर वहां से काली गिरी नाग गए और उन्होंने जाकर सूर्य भगवान का रथ घेर लिया उस रथ में पयांसुरी पाती थे।

अगले दिन दोनों बहने पानी के लिए जाती है तो कदरू ने विनीता से कहा कि अब देखो सूर्य भगवान के कैसे घोड़े हैं, रथ नागों ने घेर रखा था तो रथ काला हो गया तो विनीता बिखी का भंडार के गई वहां सोने का गरोड ओर पट्या सारी हीत थे तब सूर्य गरुड़ आकाश मंडल में गए।
तो जिस रथ में पयांसुरी पाती थी उसको नागों ने घेर रखा था तो सूर्य गरुड़ ने काली गिरी नाग को छीन – भिन्न कर दिया फिर सूर्य गरुड़ काली गिरी नाग को आकाश में लेके जा रहे थे फिर वह उनसे छूट गया और वह सीधा रमणीक देश में गिरा,वहां मतंग ऋषि के श्राप से गरुड़ नहीं जा सकता था ये पयांसुरी कि कथा है।

आमा का बार

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इसके बाद यहां पर आमा का बार लगता है आमा के बार में 16 शृंगार होते हैं,  निरंकार भगवान बहन आमा की विदाई करते हैं,आमा का विदाई का पल बहुत भावउक होता है,पूरे गांव के लोग आमा अर्थात बहन को छोड़ने के लिए साथ जाते हैं उस दौरान सारे श्रद्धालु भावुक हो जाते हैं

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निरंकार भगवान का बार

आमा के विदाई के बाद निरंकार भगवान जी का बार लगता है| निरंकार भगवान का बार को समुद्री बार भी कहते हैं, निरंकार बार में 14 रत्न होते हैं,

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धर्म ग्रंथों के अनुसार, एक बार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण स्वर्ग श्रीहीन (ऐश्वर्य, धन, वैभव आदि) हो गया था और इन्द्र सहित सारे देवता शक्तिहीन हो गए थे, ऐसे में सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गए, भगवान विष्णु ने देवताओं को असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने का उपाय बताया और यह भी बताया कि समुद्र मंथन से अमृत की प्राप्ति होगी, जिसे पीकर आप सब अमर हो जाएंगे

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समुद्र से 14 रत्न निकले समुद्र मंथन से सबसे पहले विष निकला, जिसकी ज्वाला बहुत तीव्र थी।महादेव शिव उस विष को हथेली पर रख कर उसे पी गये, देवी पार्वती ने विष को उनके कण्ठ से नीचे नहीं उतरने दिया। अतः विष के प्रभाव से शिव का कण्ठ नीला पड़ गया। इसीलिये महादेव को “नीलकण्ठ” भी कहा जाता है भोले के हथेली से थोड़ा सा विष पृथ्वी पर गिर गया, जिसे साँप, बिच्छू आदि विषैले जन्तुओं ने ग्रहण कर लिया।

समुद्र मंथन 14 रत्न- 1-विष,2-कामधेनु गाय 3- उच्चै:श्रवा घोड़ा,4. ऐरावत हाथी,5. कौस्तुभ मणि,6. कल्पवृक्ष,7. रंभा नामक अप्सरा,8. देवी लक्ष्मी,9. वारूणी अर्थात मदिरा,10. चन्द्रमा,11. पारिजात वृक्ष,12. पांचजन्य शंख,13. भगवान धन्वन्तरि,14. अमृत
निरंकार भगवान के बार में यह सब दिया जाता है|

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भगवान निरंकार से संबंधित हमारी वीडियो जरूर देखें जिससे आप को समझने में और भी आसानी होगी



One thought on “निरंकार भगवान की पूजा और पौराणिक कथा

  • May 31, 2021 at 3:47 am
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    भाई साहब आपने बहुत ही सुंदर विवरण दिया है भगवान निरंकार का लेकिन आपने आधी अधूरी बाते लिखी है जिन्हें आपने बीच मे ही छोड़ दिया है। जैसे अपने हितु चेला की उत्पत्ति की कहानी नही बताई , साथ मे प्यंसुरी की कथा भी अधूरी है उसकी पूजा क्यों कि जाति है। दिशा और ध्याण्ई दोनो अलग अलग है। निरंकार भगवान की उत्पत्ति व हितु का केदार खण्डियूँ में जाना और अन्य प्रकार के देवी देवताओं को न्यूतना, नाग ओर गरुडो की कथा भी आधी है उस काला गिरी नाग का क्या हुआ औऱ गरुड़ ऋषि के आश्रम में क्यों नही जा सकते थे काफी कुछ मिस है।लेकिन आपकी यह कोशिश बहुत अच्छी है कमसे कम इस लेख को पड़के लोगो मे जिज्ञासु तो जागेगी की आगे क्या हुआ होगा इन कहानियों में।

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