पांडव नृत्य में ये भी एक परंपरा है उत्तराखंड

पांडव नृत्य 

पांडव नृत्य भारत के उत्तराखंड राज्य का एक प्रमुख लोकनृत्य है।यह नृत्य महाभारत में पांच पांडवो के जीवन से सम्बंधित है।।पांडव नृत्य हर साल नवंबर से फरवरी में होता है। ये परंपरा वर्षों से चली आ रही है। पांडव नृत्यों का आयोजन 21 से लेकर 45 दिन तक का होता है। पांडवों को यहां की भाषा में पनो देवता कहा जाता है| नवंबर से फरवरी के बीच पहाड़ों में कामकाज काफी कम रहता है| इन दिनों यहां के लोग फुर्सत में होते हैं|

इसमें ढोल दमाऊ के थाप पर नृत्य करते हैं| रुद्रप्रयाग जिले के केदारघाटी  में पांडव नृत्य की एक परंपरा है।जिस गांव में पांडव नृत्य होता है उस गांव में उस गांव के निवासी पांडव के अवतारी लोगों को अपने घर में खाना खाने के लिए आमंत्रित करते हैं| जिसको यह की भाषा में छाकू कहा जाता है|

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उत्तराखंड को पांडवो की धरती भी कहते है। पांडव नृत्यों का आयोजन 21 से लेकर 45 दिन तक का होता है। कहते है पांडव यहीं से स्वार्गारोहणी के लिए गए थे।   पांडव जहां-जहां से  गुजरे, उन स्थानों पर विशेष रूप से पांडव लीला आयोजित होती है। पांडव नृत्य जिस गांव में होता है उस गांव के प्रत्येक परिवार एक दिन पांडवों को के अवतारी को अपने घर पर भोजन के लिए आमंत्रित करते हैं|
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गांव के परिवार ने पांडवों के अवतारी लोगों को दिन में खाने के लिए निमंत्रण दिया है जिस को यहां की भाषा में छाकू कहते है| इस दिन के लिए पूरा गांव बड़ी बेसब्री सही अपनी बारी का इंतजार करते हैं| इस दिन के लिए पूरा परिवार सुबह नहा धो कर के  पांडव देब्ताओं की सेवा के लिए तैयार रहते है|
पांडवों के अबतरी भी अपने भेस भूसा  बनो और ढोल दमाऊ के साथ उस परिवार के यहां पहुंच जाते हैं| फिर पूरा परिवार उनका स्वागत करता है| फिर गांव का पंचायती पुजारी जो पूरे गांव का पुजारी होता है| वह पूरे परिवार सहित वहां पर बाणों की पूजा कराते हैं पूरा परिवार बैठकर विधि विधान से पूजा करते हैं बनों का मतलबशस्त्र है जिसे पांडव अपने साथ में रखते थे

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,बानो की पूजा होने के बाद पांडव के अवतारी लोगों को पूरा परिवार बढ़ाई श्रद्धा और भक्ति से खाना कर आता है भोजन कराता है| पांडवों के अवतारी लोग जमीन में बैठकर खाना खाते हैं| यहां की भाषा में अवतारी लोगों को पस्वा कहा जाता है|  अब बनो  में गाय के दूध से बने मक्खन को लगाया जाता है| पांडव भोजन करने के बाद उस परिवार के आंगन में नृत्य करते हैं|

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अब जिस परिवार ने भोजन कराया है उसको आशीर्वाद देते हैं और साथ ही वह परिवार पांडवों के लिए, धान से बनाए गए चिउड़ा देते हैं| जिसको यहां की भाषा में खाजा भुखना कहते हैं| अब यहां पर पांडव खुस होकर नृत्य करते है फिर वहां से विदाई लेकर पंचायती चौक मैं चले जाते हैं|यही पर हमेसा पांडव नृत्य होता है| पांडव नृत्य के समय पूरे गांव वाले अपनी अपनी बहन रिश्तेदारों आदि को अपने गांव बुलाते हैं| पांडवों की याद में उत्तराखंड में चक्रव्यूह, कमलव्यूह और गरुण व्यूह का आयोजन होता है।

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पांडव नृत्य की विडियो