भगवान शाणेश्वर मन्दिर सिल्ला रूद्रप्रयाग उत्तराखंड

भगवान शाणेश्वर मन्दिर
शाणेश्वर महाराज जी का मंदिर (bhagwan saneshwar mandir) उत्तराखंड में rudraprayag  रुद्रप्रयाग  जिले के पास अगस्त्यमुनि से करीब 8 किलोमीटर दूर सिल्ला गांव में पड़ता है सड़क से पैदल लगभग 1से डेड किलोमीटर है|

भगवान शाणेश्वर मन्दिर का स्कन्द पुराण में वर्णन 

 https://livecultureofindia.com/भगवान-शाणेश्वर-मन्दिर.html ‎
स्कन्द पुराण 117अध्याय केदार खण्ड के अन्तर्गत भगवान शाणेश्वर सिलेश्वर महादेव की महिमा का वर्णन किया गया है
    मुनी नन्दा चन्द्र भागा: तटे 
                येन सिल्लेश्वरो भवेत्
मन्दाकिनी नदी के पूर्व तट पर  परं गोपनीय स्थान सिल्ला (सिल्लेश्वर) के नाम से प्रसिद्ध है
पूर्व काल में शील नाम के ऋषि जी थे जिनको श्रृंगी ऋषि के नाम से जाना जाता है श्रृंगी ऋषि जी ने महादेव की आराधना की इसलिए  यह शिवलिंग सिल्लेश्वर कहलाया  इसी नदी के दक्षिण भाग में अगस्त्य ऋषि का आश्रम है|

वहां से अगस्त्य ऋषि नित्य आकर भगवान शाणेश्वर महाराज जी (bhagwan saneshwar mandir )के साथ इस शिवलिंग की पूजा पाठ जप किया करते थे  भगवान शिव ने स्वयं कहा यह मेरा अत्यंत प्रिय गोपनीय स्थान है यहीं पर मुनिश्वर महादेव सिल्लेश्वर भगवान के नाम से मेरा उत्तम लिंग है

 https://livecultureofindia.com/भगवान-शाणेश्वर-मन्दिर.html ‎
महादेब मंदिर

यहां से मुनि गंगा चन्द्र भागा मन्दाकिनी नदी में मिलती हैं इस स्थान पर भगवान शिव का गोपनीय पीठ है दुर्जनों को नहीं होते हैं मुख के दर्शन जो भी भक्त जन यहां पर रूद्र मन्त्रों का जाप करता है उसे सभी प्रकार की सम्पतीयां प्राप्त हो जाती हैं|
भगवान शाणेश्वर मन्दिर लिंग के मुख दर्शन फल 
भगवान शाणेश्वर मन्दिर यहां पर मुख दर्शन का केदार यात्रा से जादा फल मिलता है
फाल्गुन माह की कृष्ण चतुर्दशी को जो भी भक्त जन मेरे मुख के दर्शन करते हैं उनके सभी पाप मिट जाते हैं और उनका पुनर्जन्म नहीं होता है|

भगवान शाणेश्वर महाराज मन्दिर सिल्ला में राक्षसों का बहुत बोल बाला था आज से 10 हजार वर्ष पहले इस स्थान पर राक्षसों का इतना हाहाकार मच गया जो भी पुजारी यहां पर भगवान का भोग लगाने जाता था तो ये राक्षस भोग के साथ पुजारी का भक्षण करते थे!

तब भगवान शाणेश्वर महाराज जी ने अगस्त्य ऋषि का आवाहन किया अगस्त्य ऋषि उस स्थान पर आये और भगवान शाणेश्वर महाराज, सिल्लेश्वर महादेव को भोग लगाने का दायित्व अपने उपर ले लिया जैंसे ही अगस्त्य

 https://livecultureofindia.com/भगवान-शाणेश्वर-मन्दिर.html ‎
महाऋषि अगस्त्य मंदिर अगस्त्यमुनि

ऋषि ने भोग लगाना शुरू किया तो राक्षस सुक्ष्म रूप धारण कर के उस भोग में छिप गए, भोग लगाने के बाद अगस्त्य ऋषि ने स्वयं भोग ग्रहण किया तो अगस्त्य ऋषि के पेट में राक्षस उछल कूद करने लगे,

तब ऋषि अगस्त्य जी ने मां भगवती कुष्मांडा देवी का आवाहन किया तब मां भगवती कुष्मांडा देवी की उत्पत्ति अगस्त्य ऋषि की कोख से हुई , तब मां भगवती ने उन सभी राक्षसों का वध किया इसी स्थान पर,
    आतापी भक्षतो येन, 
             वातापि च महाबल: 
समुद्रं सोसितम येन,
             सम अगस्त्य प्रसिद्धतो 

आतापी-वातापि नाम के दो राक्षस भागने में कामयाब हुए आतापी नाम का दैत्य सिल्ली रोह में मन्दाकिनी नदी में छिप गया ,
वातापि नाम का दैत्य चार धामों में बद्रीनाथ धाम में शरण ले ली तब से लेकर आज तक बद्रीनाथ धाम में शंख नहीं बजता है 
और जितने भी राक्षस थे सब मारे गए मां भगवती कुष्मांडा देवी के द्वारा, उसके बाद भगवान शाणेश्वर महाराज जी (bhagwan saneshwar mandir )ने मां भगवती कुष्मांडा देवी को कुमड़ी स्थान दिया वहां पर मां कुष्मांडा देवी के मंदिर से प्रसिद्ध है

जो भगवान शाणेश्वर मन्दिर शाणेश्वर महाराज जी का यह यज्ञ (हवन) 1माह का होता है,यज्ञ (हवन) से पूर्व भगवान शाणेश्वर देवरा यात्रा (गांव भ्रमण) 120 गावों की यात्रा 4 साल में करते हैं|

उसके बाद यज्ञ से पूर्व भगवान शाणेश्वर महाराज जी चतुर्दिवरा पूर्ण करने के बाद भगवान शाणेश्वर महाराज जी यज्ञ प्रारम्भ करने से 2,,3 दिन पूर्व  अपने पुजारियों के सिल्ला ब्राह्मण  गांव श्री माहेश्वर प्रसाद पुरोहित जी की तिवार में रात्रि विश्राम करते हैं

 https://livecultureofindia.com/भगवान-शाणेश्वर-मन्दिर.html ‎
saneswr doli

अगले 2 दिनों में आचार्य  ब्राह्मणों को लेने जाते हैं और कुल देवी देवताओं का भगवान शाणेश्वर मन्दिर में पूजन किया जाता है जिस दिन यज्ञ(हवन) प्रारंभ होता है|

उस दिन प्रातः काल से ही भगवान शाणेश्वर महाराज जी का पूजा पाठ सकली   करण हवन डोली का श्रृंगार  जमांण लगाकर अपने सभी पुजारियों को आशीर्वाद कुशलक्षेम पूछने के बाद सभी भक्तों को अपने यज्ञ में आमन्त्रित करना   ज्येष्ठ के माह में यह विश्व का सबसे बड़ा हवन-महायज्ञ होता है उसी परंपरा के अनुसार आज भी भगवान शाणेश्वर के भक्त जन यह विशाल लक्ष महायज्ञ करते हैं

 https://livecultureofindia.com/भगवान-शाणेश्वर-मन्दिर.html ‎

उसके बाद भगवान भगवान शाणेश्वर मन्दिर (bhagwan saneshwar mandir )के लिए प्रस्थान करते हैं मन्दिर में जाने के बाद मन्दिर की परिक्रमा करते हैं उसके बाद रूद्र कुंड का कुंड गज  करने के बाद भगवान शाणेश्वर महाराज जी सिल्लेश्वर महादेव  रूद्र कुंड के समीप विराजमान हो जाते हैं 9 दिन तक यह यज्ञ  चलता है जिसमें 10 हजार मन्त्रों की आहुति डाली जाती है

इसे आयुत होम महायज्ञ कहते हैं जलयात्रा, पूर्णाहुति , ब्रह्म भोज होने के बाद प्राचीन परंपरा के अनुसार राक्षसी कुंड का कुंड गज करने के लिए भगवान शाणेश्वर महाराज जी की बहन मां भगवती कुष्मांडा देवी को लेने आचार्य, ब्राह्मण, यजमान, कुमडी़ गांव के लिए प्रस्थान करते हैं

अगले दिन प्रातः काल से ही मां भगवती कुष्मांडा देवी का सकली करण, पूजा, पाठ,हवन, करने के बाद मां की डोली का श्रृंगार जमाण लगाने के बाद मां भगवती कुष्मांडा देवी अपने सभी भक्त जनों की कुशलक्षेम आशीर्वाद देने के बाद कुमडी़ गांव के दासों के द्वारा ढोल-दमो की तार पर अगवानी वीर क्षेत्रपाल आगे चलते हैं

 https://livecultureofindia.com/भगवान-शाणेश्वर-मन्दिर.html ‎

मां भगवती कुष्मांडा देवी सभी भक्त जनों को आशीर्वाद देने के बाद अपने पिछवानी भुखण्डु मसाण के साथ मां की डोली सिल्ला सिंगोड़ गांव के लिए प्रस्थान करती है मां कुष्मांडा देवी की डोली कुमडी़ धार से होते हुए गदनु गांव में पहुंचती है अपने सभी भक्त जनों को आशीर्वाद देते हुए गोथ खोला में हजारों की संख्या में भक्त जन मां भगवती कुष्मांडा देवी का भव्य स्वागत करते हैं गोथ खोला से चलते हुए सिंगोडा़ गांव पहुंचती है

कृपया हमारा यह ब्लॉग और वीडियो भी देखें

ज्योतिष astrology में उच्च और नीच ग्रह कौन से होते हैं,

त्रिजुगी नारायण मंदिर | world oldest religious Temple

अपने घर के मंदिर में पूजा और ध्यान रखने वाली जरूरी बातें

पहाड़ों की खुबसूरत  दिवाली

त्वचा की देखभाल करें

तांबे के बर्तन का पानी पीने के 7 फायदे

आलू टिक्की बर्गर रेसिपी

कुंडली horoscope-12 भाव में कौन सा ग्रह उसका क्या असर जाने

घूमने के शौकीन है विडियो जरूर देखें है बाबा तुंगनाथ यात्रा

 https://livecultureofindia.com/भगवान-शाणेश्वर-मन्दिर.html ‎
मां कुष्मांडा देवी सिंगोडा़ गांव में

अपने भाई को प्रणाम करने के बाद क्षेत्रपाल मन्दिर होते हुए सभी भक्त जनों को आशीर्वाद देने के बाद रावत बन्दों की तिवार में विराजमान होती है पुजारी के द्वारा मां का पूजन आरती भोग रात्रि आरती सयन आरती पयरी    रात्रि विश्राम अगले दिन प्रातः काल से ही मां भगवती कुष्मांडा देवी का पूजा पाठ हवन डोली श्रृंगार जमांण  लगाकर अपने भाई शाणेश्वर भगवान से मिलने के लिए उत्सुक मन्दिर से भगवान शाणेश्वर महाराज जी का भी पूजा पाठ हवन डोली श्रृंगार जमांण लगाकर अपनी बहन से मिलने के लिए उत्सुक हैं

 https://livecultureofindia.com/भगवान-शाणेश्वर-मन्दिर.html ‎

भगवान शाणेश्वर महाराज जी भी इसके बाद भगवान शाणेश्वर की डोली मन्दिर परिसर से होते हुए सिरकार के खेतों में अपने लाखों भक्त जनों को आशीर्वाद देते हैं

सिंगोड़ गांव से मां भगवती कुष्मांडा देवी की डोली भी भक्त जनों को आशीर्वाद देते हुए सिरकार के खेतों में जब दोनों भाई बहन का मिलन वा क्या रमणीय दृश्य इस दृश्य को देखने के लिए लाखों भक्त जन अपने अराध्य देव भगवान शाणेश्वर महाराज, मां कुष्मांडा देवी के दर्शन के लिए आ पहुंचे जिन भक्तों ने ये रमणीय दृश्य देखा उन भक्तों के सभी रोग कष्ट दूर होते हैं

 https://livecultureofindia.com/भगवान-शाणेश्वर-मन्दिर.html ‎

इसके बाद भगवान शाणेश्वर महाराज जी मां भगवती कुष्मांडा देवी राक्षसी कुंड का कुंड गज करने के लिए मन्दिर परिसर में जाते हैं भगवान शाणेश्वर महाराज जी अपनी बहन को आगे भेजते हैं| और भगवान शाणेश्वर महाराज लक्ष्मी नारायण मंदिर के पीछे जाते हैं  मां भगवती कुष्मांडा देवी कुंड गज करती

 https://livecultureofindia.com/भगवान-शाणेश्वर-मन्दिर.html ‎

जो भी कुंड गज में सर्वप्रथम हाथ लगाता है उसी दिन से 6 माह के अन्तर्गत उसको मोक्ष मिल जाता है  उसके बाद 18 दिनों तक चलने वाले

 https://livecultureofindia.com/bhagwan-saneshwar-mandir/
राक्षसी कुंड

इस राक्षसी कुंड में 1लाख मन्त्रों की आहुति दी जाती है इसे लक्ष होम महायज्ञ कहा जाता है  मां भगवती कुष्मांडा देवी राक्षसी कुंड के समीप विराजमान हो कर अपनी  नजरें राक्षसी कुंड पर बनाई रखती है भगवान शाणेश्वर महाराज जी भी यज्ञ के समीप

%25E0%25A4%25A6%25E0%25A5%258B%25E0%25A4%25A8%25E0%25A5%2580
भगवान शाणेश्वर मां भगवती कुष्मांडा देवी 

विराजमान हो जाते हैं
17 वें दिन भव्य जलयात्रा अनेक प्रकार की झांकियां निकाली जाती है उससे अगले दिन राक्षसी कुंड की पूर्णाहुति होती है उसके बाद भगवान शाणेश्वर मां भगवती कुष्मांडा देवी अपने सभी भक्त जनों को आशीर्वाद देते हैं भगवान शाणेश्वर महाराज जी अपनी बहन को अन्नपूर्णा भण्डार में भेजते हैं उसके बाद भगवान शाणेश्वर महाराज जी अपनी बहन को विदा करते हैं यह विधाई का पल बहुत रमणीय दृश्य होता है सभी भक्त जनों के आंखों से आंसू निकलते हैं
कुमडी़ गांव के लिए प्रस्थान करते हैं क्षेत्रपाल मन्दिर होते हुए सिंगोड़ गांव से होते हुए गोथ खोला में सभी भक्त जनों को आशीर्वाद देते हुए गदनु गांव में पहुंचती है वहां भी सभी भक्त जनों को आशीर्वाद देते हुए कुमड़ी धार होते हुए अपने मन्दिर में पहुंचती है उसके बाद भगवान शाणेश्वर महाराज जी परंपरा के अनुसार आज भी भक्त जन कुमडी़ में तीन दिन का यज्ञ आचार्य श्री माहेश्वर प्रसाद पुरोहित जी के सानिध्य में होता है
जलयात्रा पूर्णाहुति होने के बाद मां भगवती कुष्मांडा देवी अपने सभी भक्त जनों को आशीर्वाद देने के बाद अपने मन्दिर में विराजमान हो जाती है
आचार्य, ब्राह्मणों को विदा करते हैं                                                                                                                                                                        “आचार्य पंकज पुरोहित: भगवान शाणेश्वर मन्दिर सिल्ला”
भगवान शाणेश्वर मन्दिर से संबंधित हमारी डॉक्यूमेंट्री फिल्म