पहाड़ों की खुबसूरत इगास बग्वाल ( दिवाली )

पहाड़ों की खुबसूरत दिवाली 

उत्तराखंड की सभ्यता-संस्कृति यहां के रीति-रिवाज और त्योहारों को मनाने का तरीका बेहद ही अनोखा  है। यहाँ की परंपराएं और संस्कृति बेहद ही पौराणिक मानी जाती है।उत्तराखंड में कई जगह इगास बग्वाल (दिवाली ) मनाई जाती है।

इस दीपावली को जिसे हम पहाड़ी में इगास-बग्वाल के नाम से भी जानते हैं इसका सभी  बेसब्री से इंतजार करते हैं।  दीपावली के 11 दिन बाद इगास बग्वाल मनाई जाती है। ये दीपावली की तरह ही होती है,
 इगास बग्वाल ( दिवाली ) का धार्मिक महत्व 
हिंदू धार्मिक ग्रंथों में कार्तिक शुक्ल एकादशी (इगास बग्वाल – दिवाली )को देव जागरण का पर्व माना गया है,इस दिन श्री हरि जाग जाते हैं। इस पावन तिथि को देवउठनी ग्यारस या देव प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। चार महीने से विराम लगे हुए मांगलिक कार्य भी इसी दिन से शुरू हो जाते हैं।

विष्णु पुराण के अनुसार भगवान विष्णु ने शंखासुर नामक भयंकर राक्षस का वध किया था और फिर आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी जिसे हरिशयनी एकादशी कहते हैं,

इस दिन क्षीर सागर में श्री हरि ने शेषनाग की शय्या पर शयन किया। चार मास की योग निद्रा त्यागने के बाद भगवान विष्णु के जागने का तात्पर्य है कि चार मास में स्वाध्याय,पूजा-अर्चना से अर्जित ऊर्जा को हम सत्कर्मों में बदल दें ताकि हमारे सद्गुणों का प्रभाव हम सभी महानुभावों के जीवन में दिखें।
उत्तराखंड में केसे मानते हैं| इगास बग्वाल ( दिवाली )
उत्तराखंड में इगास बग्वाल ( दिवाली)मनाने के तरीके लगभग एक जैसे ही हैं कुछ जगह पर अलग अलग हो सकते हैं जिसे हम आगे आपको दिखाएंगे
इस दिन सुबह उठ नहा धोकर स्थानीय देवी-देवताओं की  पूजा की जाती है। और करीब करीब सभी घरों में पूरी और पकौड़ी बनाई जाती है| सबसे पहले देवताओं को चढ़ाया जाता है दिवाली के दिन पशुओं और पानी के स्रोतों की भी पूजा की जाती है फिर पशुओं के लिए बनाए गये खाने की पूजा की जाती है

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पहाड़ों की खुबसूरत इगास बग्वाल ( दिवाली )

और गौशाला जाकर उनको खिलाया जाता है| देवताओं और पशुओं की पूजा कर खिलाने के बाद, खुद खाते हैं| और भेलू के लिए लकड़ी लेने के लिए जंगल जाते हैं|

भेलू, गढ़वाल में दीपावली की रात्रि को घुमाया जाने वाला एक पारम्परिक अग्नि खेल, इस दिन विशेष तौर पर दाल के पकोड़े बनाए जाते हैं| लेकिन आजकल बेसन गोभी अलग-अलग प्रकार के पकोड़े भी बनाए जाने लगे हैं

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Diwali is celebrated in village of Uttarakhand

शाम होते ही घर में पूजा अर्चना करने के बाद भेलू  की पूजा करने के लिए निकल पड़ते हैं| आसपास के सभी लोग अपने अपने भेलू को लेकर एक जगह पर इकट्ठा हो कर जलाने से पहले  भेलू की पूजा करते हैं|फिर एक जगह पर सारे लोग इकट्ठा होने लगते हैं

ढोल और दमाऊ कि थप्प पर  अपने-अपने ब्लू को जलाकर भेलू खेलने लगते हैं| भेलू खत्म होने के बाद नृत्य करते हैं और उसके बाद यहां की पारंपरिक रिवाज ग्रुप नृत्य  झूमेला शुरू हो जाता है

इगास बग्वाल ( दिवाली ) को लेकर क्या पौराणिक मान्यताएं और कहानियां 
इगास बग्वाल ( दिवाली ) को लेकर अलग अलग  पौराणिक मान्यताएं और कहानियां भी हैं।
कहा जाता है कि भगवान राम के बनवास के बाद अयोध्या पहुंचने पर लोगों ने दीये जलाकर उनका स्वागत किया था। लेकिन कहते हैं कि उत्तराखंड के पहाड़ों में भगवान राम के पहुंचने की खबर दीपवाली के ग्यारह दिन बाद मिली थी।

इसके बाद ग्रामीणों ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए ग्यारह दिन बाद दीपावली का त्योहार मनाया था।
कुछ का मानना है कि इगास मनाने का  कारण  गढवाल नरेश महिपति शाह के सेनापति वीर माधोसिंह गढवाल तिब्बत युद्ध में गढवाल की सेना का नेतृत्व कर रहे थे

गढवाल सेना युद्ध जीत चुकी थी लेकिन माधोसिंह सेना की एक छोटी टुकडी के साथ मुख्य सेना से अलग होकर भटक गये सबने उन्हें वीरगति को प्राप्त मान लिया लेकिन वो जब वापस आये तो सबने उनका स्वागत बडे जोरशोर से किया गया था

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दंतकथाओं के मुताबिक ये भी कहा जाता है कि टिहरी जिले के चंबा का एक व्यक्ति ( दिवाली )भैला बनाने के लिए लकड़ी लेने जगंल गया था। वो व्यक्ति दीपावली के दिन घर नहीं लौटा था। काफी खोजबीन के बाद भी उस व्यक्ति का कहीं पता नहीं लगा तो ग्रामीणों ने दीपावली नहीं मनाई।

लेकिन 11 दिन बाद वो व्यक्ति गांव वापस लौटा था। इस वजह से गांव वालों ने उस दिन ही इस बग्वाल को मनाया था। तब से इगास बग्वाल के दिन भैला खेलने की परंपरा शुरू हुई।

इसके अलावा कुछ लोग इसकी कहानी को महाभारत से भी जोड़ते हैं। कहा जाता है कि एक बार ( दिवाली )के दिन पांडवों में भीम मौजूद नहीं थे। वो एक दुष्ट का संहार करने के लिए गए थे। आखिरकार जब भीम वापस लौटे तो पांडवों ने इस दिन दीपावली मनाई थी। गढ़वाल के कई इलाकों में इगास बग्वाल को भीम दीवाली के नाम से भी जाना जाता है।

सुनील जमलोकी

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